Daily Current Affairs 2020 RTI कानून में बदलाव से कम होंगी सूचना आयोग की शक्तियां, पारदर्शिता पर भी असर | Daily Current Affairs 2020

RTI कानून में बदलाव से कम होंगी सूचना आयोग की शक्तियां, पारदर्शिता पर भी असर

Posted by
Subscribe for News Feed

आरटीआई कार्यकर्ता, विपक्षी पार्टियां और यहां तक कि पूर्व सूचना आयुक्त भी इस तरह के किसी संशोधन का कड़ा विरोध कर रहें हैं. उन्हें डर है कि इस संशोधन से सूचना आयोग और सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता प्रभावित होगी.

केंद्र सरकार सूचना अधिकार कानून (RTI Act) 2005 में बदलाव करने जा रही है. 2018 में भी मोदी सरकार ने ऐसा करने की कोशिश की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली. अब सरकार ने फिर से संशोधन बिल पेश किया है. सरकार केंद्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और सेवा शर्तों में बदलाव लाने जा रही है. संशोधन बिल में प्रस्तावित है कि मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और सेवा शर्तों को सरकारें निर्धारित करेंगी. यह बिल लोकसभा से पास कर दिया गया है.

क्या कहता है संशोधन बिल

सूचना अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019 में मूलतः दो बदलाव प्रस्तावित है:

1- इसमें मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल में बदलाव प्रस्तावित है. अब तक यह व्यवस्था है कि सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 साल का होगा. लेकिन अधिकतम उम्र सीमा 65 साल होगी. इसमें जो भी पहले पूरा होगा, उसे माना जाएगा. सरकार अब इस व्यवस्था को बदल कर इस कार्यकाल को ‘केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित’ करने जा रही है. यानी मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का कार्यकाल वह होगा जो सरकार निर्धारित करेगी.

2- वेतन और भत्ते भी वही होंगे जो केंद्र सरकार निर्धारित करेगी. मूल कानून में यह व्यवस्था है कि केंद्रीय स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों में चुनाव आयोग का नियम लागू होगा. यानी उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की तरह वेतन भत्ते प्राप्त होंगे. राज्य स्तर पर राज्य के मुख्य सूचना अधिकारी का वेतन भत्ता राज्य चुनाव आयुक्त के जैसा होगा. जबकि राज्य अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन भत्ता राज्य के मुख्य सचिव के जैसा होगा.

चुनाव आयोग एक्ट 1991 कहता है कि केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तें सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर होंगी. इस तरह देखें तो केंद्रीय सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होती हैं.

यह बदलाव क्यों?

आरटीआई संशोधन बिल 2019 के ‘स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजन्स’ सेक्शन में इस संशोधन का कारण बताया गया है कि भारतीय चुनाव आयोग और केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों की कार्यप्रणालियां ‘एकदम भिन्न’ हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित है. यह केंद्र में संसद के लिए और राज्य में विधानसभाओं के लिए चुनाव संपन्न कराता है, यह राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव कराता है जो कि संवैधानिक पद हैं. जबकि केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग एक कानूनी निकाय है जो कि आरटीआई एक्ट 2005 के द्वारा स्थापित है.   

यह कहता है कि भारतीय चुनाव आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों के कार्यक्षेत्र अलग अलग हैं, अत: उनके पद और सेवा शर्तों को तार्किक बनाए जाने की जरूरत है.

संशोधन का क्या प्रभाव पड़ेगा

आरटीआई कार्यकर्ता, विपक्षी पार्टियां और यहां तक कि पूर्व सूचना आयुक्त भी इस तरह के किसी संशोधन का कड़ा विरोध कर रहें हैं. उन्हें डर है कि इस संशोधन से सूचना आयोग और सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता प्रभावित होगी. 2018 में यह ​विधेयक पेश हुआ था और सांसदों में वितरित भी हो गया था, लेकिन इसी विरोध के कारण सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे.

2013 से 2018 तक भारत के केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके प्रोफेसर श्रीधर आचार्युलू कहते हैं कि यह संशोधन सूचना आयोग को सरकार के अधीन ला देगा. उनके मुताबिक, इसके खतरनाक परिणाम होंगे. सूचना अधिकार का पूरा क्रियान्वयन इसी बात पर टिका है कि सूचना आयोग इसे कैसे लागू करवाता है. आरटीआई एक्ट की स्वतंत्र व्याख्या तभी संभव है जब यह सरकार के नियंत्रण से आजाद रहे.

आचार्युलू यह भी चिंता जताते हैं कि जब केंद्रीय सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त आदि की हैसियत/पदवी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर है. अगर यह घटा दी जाएगी तो सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों को निर्देश जारी करने का उनका अधिकार भी कम हो जाएगा. इसलिए यह संशोधन ‘आरटीआई एक्ट की हत्या’ कर देगा. यह संघीय तंत्र की अवज्ञा होगी, इससे गुड गवर्नेंस और लोकतंत्र कमजोर होगा.

केंद्रीय सूचना आयोग में 2009 से 2012 तक सूचना आयुक्त रह चुके शैलेश गांधी इस संशोधन को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए कहते हैं कि इस संशोधन का मतलब है कि सरकार सूचना आयोग स्वतंत्रता को नियंत्रित करना चाहती है. वे कहते ​हैं कि यहां तक कि इस संशोधन का कोई पर्याप्त कारण भी नहीं दिया जा रहा है. जो कारण दिया गया है, उसे ‘पूरी तरह अपर्याप्त’ बताते हुए वे कहते हैं कि भारत का आरटीआई एक्ट दुनिया में अच्छे कानूनों में से एक है. अगर इसमें कोई कमी है तो वह इसके क्रियान्वयन की है. कम से कम सरकार को जो कुछ भी करना था, वह एक सार्वजनिक परामर्श के बिना नहीं करना चाहिए था.

एक प्रमुख आरटीआई कार्यकर्ता और पूर्व कमोडोर लोकेश बत्रा कहते हैं, सरकार की ओर से सूचना आयोग की स्वायत्तता छीनने और नागरिकों के जानने के अधिकार को खत्म कर देने की यह दूसरी कोशिश है.

कमोडोर बत्रा यह भी कहते हैं कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2019 के (अंजलि भारद्वाज व अन्य बनाम भारतीय संघ एवं अन्य के मामले में दिए गए) निर्णय के ​भी खिलाफ होगा. सुप्रीम कोर्ट में सूचना आयोग में खाली पदों के मामले को निपटाते हुए कहा था कि आरटीआई एक्ट के सेक्शन 13(5) के तहत केंद्रीय सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त की नियुक्ति पर वही नियम और शर्तें लागू होंगी, जो केंद्रीय चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के मामले में लागू होती हैं.

Source : Aaj Tak

Subscribe for News Feed

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*