चांद पर भारत की नींव रखने वाले डॉक्टर विक्रम साराभाई, जो परमाणु बम के ख़िलाफ़ थे- विवेचना | Current Affairs, Current Affairs 2019

चांद पर भारत की नींव रखने वाले डॉक्टर विक्रम साराभाई, जो परमाणु बम के ख़िलाफ़ थे- विवेचना

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12 अगस्त, 1919 को जब अहमदाबाद के कपड़ा मिल मालिक अंबालाल साराभाई के घर एक लड़का पैदा हुआ तो सबका ध्यान सबसे पहले उसके कानों की तरफ़ गया.

वो कान इतने बड़े थे कि जिसने भी देखा उसी ने कहा कि वो गांधीजी के कानों से बहुत मिलते हैं.

अंबालाल के करीबी लोगों ने मज़ाक भी किया कि इन कानों को पान की तरह मोड़ कर उसकी गिलोरी बनाई जा सकती है. इस लड़के का नाम विक्रम अंबालाल साराभाई रखा गया.

उस समय साराभाई के अहमदाबाद वाले घर में भारत के चोटी के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक जैसे जगदीश चंद्र बसु और सीवी रमण, मशहूर इतिहासकार जदुनाथ सरकार, राजनेता और वकील बुलाभाई देसाई, जानी मानी नृत्यांगना रुक्मणी अरुंदेल और दार्शनिक गुरु जिद्दू कृष्णामूर्ति जैसे लोग ठहरा करते थे.

साल 1920 में रविंद्र नाथ टैगोर अहमदाबाद आए थे और साराभाई के घर पर ही रुके थे.

विक्रम साराभाई की जीवनी लिखने वाली अमृता शाह बताती हैं, “टैगोर को किसी शख़्स के माथे को देख कर उसके बारे में भविष्यवाणी करने का शौक़ था. जब नवजात विक्रम को उनके सामने ले जाया गया तो उन्होंने उनके चौड़े और असमान्य माथे को देख कर कहा था, “ये बच्चा एक दिन बहुत बड़े काम करेगा.”

हमेशा विचारों में डूबे

बाद में जब विक्रम साराभाई ने केंब्रिज में पढ़ने का फ़ैसला किया तो टैगोर ने उनके लिए एक ‘रिकमंडेशन लेटर’ लिखा था.

विक्रम साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई आज भारत की जानी-मानी नृत्यांगना हैं.

वो बताती हैं कि उन्होंने अपने पिता को हमेशा अपने विचारों में मग्न देखा. मशहूर चित्रकार रोडां की कलाकृति ‘थिंकर’ की तरह उनका हाथ हमेशा सोच की मुद्रा में उनकी ठुड्डी पर रहता था.

मल्लिका याद करती है, “मेरे पिता ज़मीन से जुड़े हुए शख़्स थे. हर एक की बात वो बहुत ध्यान से सुनते थे. हमेशा सफ़ेद खादी का कुर्ता पाजामा पहनते थे. जब बहुत ज़रूरी होता था तो वो सूट पहनते थे. लेकिन उसके ऊपर जूते की बजाय कोल्हापुरी चप्पल पहना करते थे.वो हम दोनों बच्चों पर बहुत गर्व करते थे.”

“वो बहुत लोकतांत्रिक इंसान थे. मुझे याद है एक बार वो कार ख़रीदना चाह रहे थे. उन्होंने हम सब से पूछा कि किस रंग की कार ली जाए. मैं तीन साल की थी.”

“मैंने हठ पकड़ ली कि अम्मा की कार गुलाबी रंग की होगी. उन्होंने और मेरी मां ने पूरे तीन दिनों तक मुझे समझाया और जब मैं मानी तभी उन्होंने काले रंग की फ़िएट कार ख़रीदी.”

होमी जहांगीर भाभा ने जीवनसाथी से मिलवाया

कैंब्रिज से वापस लौटने के बाद विक्रम साराभाई ‘इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस’ बंगलौर चले गए, जहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमण की देखरेख में अपना शोध जारी रखा.

वहीं, उनकी मुलाकात महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से हुई, जिन्होंने उनकी मुलाकात मशहूर नृत्यांगना मृणालिनी स्वामीनाथन से कराई जो बाद में उनकी पत्नी बनीं.

मल्लिका साराभाई याद करती हैं, “होमी भी अच्छी चीज़ों के पारखी थे. कलाकार थे और स्वयं चित्र बनाया करते थे. मेरे पिता और उनमें बहुत दोस्ती थी. वो अक्सर मेरे पिता को चिढ़ाते थे कि तुम इतने ख़ूबसूरत भारतीय कपड़ों में क्यों घूमते हो ? एक वैज्ञानिक की तरह कपड़े क्यों नहीं पहनते ? मेरी मां और भाभा बैडमिंटन पार्टनर थे. उन्होंने ने ही मेरे पिता को पहली बार मेरी मां से मिलवाया था.”

दिलचस्प बात ये है कि शुरू में विक्रम और मृणालिनी एक दूसरे के प्रति आकर्षित नहीं थे.

अमृता शाह बताती हैं, “मृणालिनी और विक्रम जब पहली बार मिले तो उन्होंने एक दूसरे को पसंद नहीं किया. मृणालिनी टेनिस शॉर्ट्स मे थी और विक्रम को उनकी ये पोशाक रास नहीं आई.”

“बाद में वो बहुत शिद्दत से भरतनाट्यम सीखने लगीं. वो इस नृत्य से इस हद तक जुड़ी हुई थी कि उन्होंने अविवाहित रहने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन विक्रम ने उनसे मिलना-जुलना शुरु कर दिया. वो साथ साथ भुट्टा खाते थे.”

“मृणालिनी उन्हें बांगला गीत सुनाती थीं जो उन्होंने शांति निकेतन के अपने प्रवास के दौरान सीखे थे. विक्रम उन्हें कालिदास के उद्धरण सुनाते थे.”

ना-ना करते शादी और ट्रेन में हनीमून

दोनों ऊपरी तौर से तो कह रहे थे कि उनका शादी का कोई इरादा नहीं है, लेकिन दोनों धीरे-धीरे उसी तरफ़ बढ़ रहे थे. उनकी शादी पहले वैदिक रीति से हुई फिर उन्होने सिविल मैरेज भी की. शादी के दिन मृणालिनी ने सफ़ेद खद्दर की साड़ी पहन रखी थी और उनके शरीर पर ज़ेवरों की जगह फूल थे. विक्रम के अनुरोध पर मृणालिनी और उनकी एक दोस्त ने रामायण के हिरण वाले दृश्य पर एक नृत्य किया था.”

जिस दिन उनकी शादी हुई उसी दिन वो ट्रेन से बंगलौर से अहमदाबाद के लिए रवाना हुए. वो भारत छोड़ो आंदोलन के दिन थे. आंदोलनकारियों ने हर जगह रेल की पटरियां उखाड़ दी थीं जिसकी वजह से जो यात्रा 18 घंटे में पूरी होनी थी, उसे पूरा होने में पूरे 48 घंटे लगे. इस तरह विक्रम और मृणालिनी ने अपना हनीमून ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास के कूपे में मनाया.

जब विक्रम अपनी नई-नवेली पत्नी के साथ अहमदाबाद अपने घर पहुंचे तो वहां उदासी छाई हुई थी, क्योंकि विक्रम की बहन मृदुला आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के कारण 18 महीने की जेल की सज़ा काट रही थीं.

अंबालाल साराभाई ने प्रशासन से अनुरोध किया कि उन्हें छोड़ दिया जाए ताकि वो अपने भाई और भाभी से मिल सकें. गवर्नर रॉजर लमले इसके लिए तैयार भी हो गए लेकिन मृदुला ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया.

कभी बंदर तो कभी नीले कमल का तोहफ़ा

विक्रम का अपनी होने वाली पत्नी को उपहार देने का अंदाज़ सबसे अलग हुआ करता था.

अमृता शाह बताती हैं, “मृणालिनी ने एक बार हंसते हुए मुझसे कहा था मुझे उनसे कभी भी कोई सामान्य तोहफ़ा नहीं मिला. मेरी मंगनी पर उन्होंने करोड़पति होते हुए भी फ़िरोज़े की बहुत सस्ती लेकिन सुंदर तिब्बती अंगूठी दी थी.”

“एक बार उन्होने श्रीलंका में पाए जाने वाला बंदर प्रजाति का ‘स्लेंडर नोरिस’ मुझे भिजवाया था जिसे लेने से मैंने साफ़ इनकार कर दिया था. शादी के दिन विक्रम ने तांबे की एक ट्रे पर बहुत ही दुर्लभ नीले रंग का कमल का फूल उन्हें भिजवाया था. किसी के प्रति प्यार का इससे सुंदर इज़हार हो ही नहीं सकता था.”

सीटी बजाते हुए लैब में आते थे

विक्रम साराभाई बहुत मेहनत करते थे. वो वैज्ञानिक होने के साथ-साथ बहुत अच्छे प्रशासक भी थे. तनाव से मुक्ति के लिए वो हमेशा संगीत का सहारा लिया करते थे. कहा जाता है कि उनके पास रिकॉर्ड्स का बहुत ज़बरदस्त संग्रह था. कुंदनलाल सहगल उनके पसंदीदा गायक थे और उनका गाया गाना ‘सो जा राजकुमारी’ उन्हें बहुत पसंद था.

उन्हें सीटी बजाने का बहुत शौक था. उनके साथ काम करने वाले बताते हैं कि वो प्रयोगशाला में आ गए हैं, इसका पता उन्हें तब चलता था जब वो ‘ब्रिज ऑन द रिवर क्वाए’ की धुन की सीटी बजाते हुए सीढ़ियां चढ़ रहे होते थे और उनकी चप्पलों की आवाज़ गूंज रही होती थी.

मल्लिका साराभाई याद करती हैं, ‘उन्हें शास्त्रीय पश्चिमी और भारतीय संगीत का बहुत शौक था. उनको टैगोर और सहगल के गाने बहुत पसंद थे.”

फ़िटनेस का ख़याल और खाने का शौक़

विक्रम साराभाई अपने वज़न के प्रति बहुत जागरूक रहते थे. सुबह तड़के उठते थे. 12 बार सूर्य नमस्कार करते थे और मौका मिलने पर तैरते थे. घर पर खाने की मेज़ पर वो दही, अचार, पापड़ और सलाद के साथ सिर्फ़ एक रोटी खाया करते थे.

वो अक्सर दूसरों की प्लेट से एक निवाला उठा कर कहते थे, “ये मेरी प्लेट नहीं हैं. इसलिए इसकी कैलोरी मुझे नहीं चढ़ेगी.”

मल्लिका साराभाई याद करती हैं, “वो एक बड़े फ़ूडी (खाने के शौक़ीन) थे. लेकिन हमेशा अपने वज़न का ध्यान रखते थे. हमेशा दुबले पतले और फ़िट रहने की कोशिश करते थे. उनको नए तरह के खाने खाने का शौक था. मेरी मां ने जब शादी की तो वो पूरी तरह से मांसाहारी थीं. उन्होंने न सिर्फ़ शाकाहारी परिवार में शादी की बल्कि शाकाहारी राज्य में भी शादी की.”

“चूंकि पापा को खाने का बहुत शौक था, इसलिए मेरी मां अलग-अलग देशों की रेसेपी को शाकाहारी बना कर घर में बनाती थी. जब हम बच्चे थे तब से ही हमें मेक्सिकन और स्पेनिश खाने का स्वाद लग गया था. अब तो इटैलियन खाना हर जगह मिलता है लेकिन तब हमारा घर अकेला घर था जहां दुनिया भर के देशों के खाने बनाए जाते थे.”

शादी के 25 साल बाद दूसरी औरत से सम्बन्ध

अपनी शादी के करीब 25 साल बाद उनका एक महिला कमला चौधरी से सम्बन्ध हो गया था, लेकिन उन्होंने उसे कभी छिपाया नहीं.

उनकी बेटी मल्लिका साराभाई बताती हैं, “पापा का कमला चौधरी से ‘इनवॉल्वमेंट’ था. उस समय मुझे बहुत दुख होता था और मैं उनसे बहुत बहस करती थी. जब मैं बड़ी हुई तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि दो लोगों को प्यार करना संभव है.”

“मैं उनसे तर्क करती थी कि आपको हम में से एक को चुना होगा. आप दोनों के साथ नहीं रह सकते. हम बहुत ईमानदार और बेबाक बहस करते थे नैतिकता और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व के बारे में. अगर परिवार एक तरफ़ हो और प्यार दूसरी तरफ़ हो तो हमें किसका त्याग करना चाहिए. और अगर त्याग न करें और इससे सब लोगों को तकलीफ़ हो तो क्या ये जायज़ है.”

विक्रम साराबाई लकीर के फ़कीर नहीं थे और हर विषय पर उनकी सोच अलग रहती थी. अमृता शाह बताती हैं, “वो खुले दिमाग के व्यक्ति थे. उनके विचारों का दायरा बहुत बड़ा था. दोनों ने अपने सम्बन्धों को छिपाने की कभी कोशिश नहीं की लेकिन इस दौरान उनका अपनी पत्नी से प्यार कभी कम नहीं हुआ.

वो उनको पहले की तरह चाहते रहे मगर साथ ही कमला के साथ खुले सम्बन्धों के बावजूद उनकी पत्नी से उस तरह की तीव्र प्रतिक्रिया नहीं आई जो कि इस तरह के मामलों में आती है, ख़ासकर ये देखते हुए कि मृणालिनी अपने ज़माने में बहुत बेबाक और मुंहफट महिला मानी जाती थीं.”

होमी भाभा के उत्तराधिकारी

1966 में जब होमी भाभा की अचानक विमान दुर्घटना में मौत हो गई तब लविक्रम साराभाई को उनकी जगह परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. हांलाकि उनकी परमाणु शोध की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी.

अमृता शाह बताती हैं, “भाभा का जो व्यक्तित्व था और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के साथ उनका जो सम्बन्ध था, उसे देखते हुए उनके उत्तराधिकारी को उनके क़द के समकक्ष होना चाहिए था. कुछ लोगों को इस पद की पेशकश की गई, लेकिन बात बनी नहीं. इसके बाद साराभाई से ये पद संभालने के लिए कहा गया. वो पहले से भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम चला रहे थे. इसके साथ परमाणु विभाग की ज़िम्मेदारी लेना बहुत कठिन काम था.”

“दूसरी बात ये थी कि साराभाई ने ही अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव रखी थी और उनकी टीम शुरू से ही उनके साथ काम कर रही थी. लेकिन परमाणु कार्यक्रम की टीम पहले से तैयार थी. इसलिए जब एक बाहरी व्यक्ति उस विभाग के प्रमुख के तौर पर आया तो कुछ लोगों ने उसे पसंद नहीं किया, जिसमें भाभा आणविक रिसर्च सेंटर के प्रमुख होमी सेठना प्रमुख थे. लेकिन राजा रामन्ना का मानना था कि उस समय इस पद के लिए साराभाई के स्तर के ही शख़्स की ज़रूरत थी.”

डॉक्टर कलाम के गुरु

विक्रम साराभाई भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के नाम से मशहूर एपीजे अब्दुल कलाम के गुरु थे. एक बार कलाम को साराभाई का संदेश मिला कि वो उनसे दिल्ली में मिलना चाहते हैं. कलाम कई फ़्लाइट्स बदल कर दिल्ली पहुंचे. साराभाई ने उन्हें सुबह साढ़े तीन बजे मिलने का समय दिया.

कलाम अपनी आत्मकथा ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में लिखते हैं, “मैं परेशान था कि मैं इतनी सुबह अशोका होटल कैसे पहुंचूँगा. इसलिए मैंने होटल की लॉबी में ही रात बिताने का फ़ैसला किया. होटल का खाना खाना मेरी जेब पर भारी पड़ता, इसलिए मैंने एक ढाबे में खाना खाया और रात 11 बजे फिर लॉबी में पहुंच गया.”

“तीन बजे के आसपास वहां एक और शख़्स आ कर बैठ गए. उन्होंने सूट पर एक धारीदार टाई बाँध रखी थी और उनके जूते चमक रहे थे. ठीक साढ़े तीन बजे हम दोनों को साराभाई के कमरे में ले जाया गया. साराभाई ने हमरा स्वागत करते हुए हमारा एक दूसरे से परिचय करवाया, कलाम अंतरिक्ष विभाग में मेरे साथी हैं और ये हैं ग्रुप कैप्टेन नारायणन जो वायुसेना मुख्यालय में काम करते हैं.”

कलाम लिखते हैं, “कॉफ़ी के बाद डॉक्टर साराभाई ने हम दोनों को रॉकेट असिस्टेड टेक ऑफ़ यानि RATO की अपनी योजना समझाई. उन्होंने कहा कि इसकी मदद से भारतीय युद्धक विमान हिमालय में छोटे रनवे से भी टेक-ऑफ़ करने में सक्षम होंगे.”

“थोड़ी देर बाद उन्होंने हमदो नों को कार में बैठने के लिए कहा. वो हमें अपने साथ फ़रीदाबाद की तिलपत रेंज ले गए. फिर उन्होंने हम दोनों से एक गुरु की तरह पूछा, अगर मैं तुम्हें शोध के लिए एक राकेट उपलब्ध करा दूँ, तो क्या तुम 18 महीनों के दर उसका स्वदेशी संस्करण बना कर हमारे एचएफ़- 24 विमान पर फ़िट कर पाओगे ? हम दोनों ने एक साथ कहा, “ये संभव है.” यह सुनते ही उनकी बांछें खिल गईं. उन्होंने अपनी कार से हम दोनों को वापस अशोका होटल ड्रॉप किया और वो प्रधानमंत्री से नाश्ते पर मिलने उनके निवास स्थान चले गए.”

परमाणु बम बनाने के हमेशा ख़िलाफ़

विक्रम साराभाई शुरु से ही परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के पक्षधर थे.

‘इंडिया टुडे’ के संपादक राज चेंगप्पा अपनी किताब ‘वेपन ऑफ़ पीस’ में लिखते हैं, “परमाणु बम बनाने के मुद्दे पर विक्रम साराभाई और होमी भाभा के विचार बिल्कुल नहीं मिलते थे. भाभा की मृत्यु के पांच महीने बाद जब उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख का काम संभाला तो उन्होंने सबसे पहले भारत के नए-नए परमाणु बम कार्यक्रम को समाप्त करने की तैयारी शुरू कर दी.

परमाणु वैज्ञानिक राजा रामन्ना याद करते हैं कि साराभाई का मानना था कि हथियार के रूप में परमाणु बम बेकार की चीज़ है. वो सिर्फ़ एक कागज़ी शेर है. परमाणु बम के प्रति साराभाई की इस सोच से मोरारजी देसाई बहुत खुश हुए. कई साल बाद जब वो प्रधानमंत्री बन गए तो उन्होंने राजा रामन्ना से कहा, “साराभाई समझदार लड़का था. वो पागल भाभा तो पूरी दुनिया को उड़ा देना चाहता था.”

जब विक्रम के सामने भाभा का ये तर्क रखा गया कि परमाणु बम बनाने में बहुत कम ख़र्च होगा तो उनका जवाब था, “आप मुझसे पूछ सकते हैं कि दो गज़ कपड़े की कीमत क्या होगी? लेकिन ये दो गज़ कपड़ा बग़ैर किसी करघे या मिल के तो बनाया नहीं जा सकता.”

इंदिरा गांधी और विक्रम साराभाई

इंदिरा गांधी विक्रम साराभाई को बहुत मानती थीं. वो उन चंद लोगों में से थे जिन्हें वो उनके पहले नाम से पुकारती थीं. विक्रम के निजी सचिव के आर रामनाथ बताते हैं कि जब भी इंदिरा गांधी उनके शहर में आती थी, उनका काम होता था शहर में उपलब्ध सबसे लाल गुलाबों का ‘बुके’ तैयार करवाना, जिसे विक्रम साराभाई खुद अपने हाथों से इंदिरा गांधी को दिया करते थे लेकिन 1971 का अंत आते आते इन संबंधों में खटास आनी शुरू हो गई थी.

राज चेंगप्पा ‘वेपन ऑफ़ पीस’ में लिखते हैं, “भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले नवंबर के आख़िरी सप्ताह में इंदिरा गांधी ने साराभाई को मिलने के लिए बुलाया. उन्होंने उनसे स्पष्ट कहा कि वो उनके नेतृत्व में एक अंतरिक्ष आयोग बनाने जा रही हैं, इसलिए वो परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख का पद छोड़ दें. साराभाई ने अपने आप को तिरस्कृत महसूस किया.”

”उन्हें लगा कि इंदिरा गांधी का अब उनमें विश्वास नहीं रहा. श्रीमती गांधी ने कहा कि ये बात सही नहीं है. वो बोलीं, ‘अगर आप इसी गति से काम करते रहे तो हम बहुत जल्दी आपको खो देंगे.’ साराभाई बहुत निराश हो कर इंदिरा के दफ़्तर से बाहर निकले और उनके कुछ दोस्तों के अनुसार उन्होंने ये भी सोचा कि वो इस्तीफ़ा दे दें. लेकिन भारत-पाकिस्तान युद्ध ने इस संकट को टाल दिया. इससे पहले कि अंतरिक्ष और परमाणु विभाग को विभाजित करने की सार्वजनिक घोषणा होती, विक्रम साराभाई का स्वर्गवास हो गया.”

सीने पर किताब रखे दुनिया से विदा हुए

30 दिसंबर, 1971 को विक्रम साराभाई त्रिवेंद्रम के कोवालम बीच गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे. सुबह जब वो सो कर नहीं उठे तो उनके कमरे का दरवाज़ा तोड़ा गया. मच्छरदानी के अंदर वो शांतिपूर्व लेटे हुए थे. उनके सीने पर एक किताब पड़ी हुई थी. जब डाक्टर ने उनकी जांच की तो पता चला कि दो घंटे पहले उनका स्वर्गवास हो चुका था. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 52 साल.

मल्लिका साराभाई याद करती हैं, “मैं शूटिंग कर रही थी अपनी पहली फ़िल्म की, तभी अम्मा का फ़ोन आया डायरेक्टर के पास कि मल्लिका को घर वापस ले आओ. गाड़ी में वापस आते समय मैं सोच रही थी कि अम्मा को कुछ हुआ है. मैं सोच तक नहीं सकती थी कि पापा को कुछ हो सकता है.”

“जब मैं घर पहुंची तो नीचे गाड़ियों की कतार खड़ी हुई थी. लोग सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे और रो रहे थे. जब मैं ऊपर गई तो पापा के सेक्रेट्ररी मुझे अंदर ले गए. वहाँ अम्मा बेडरूम में रो रही थी. उन्होंने मुझसे सिर्फ़ इतना कहा, ‘मल्लिका पापा इज़ गॉन.’ मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि ‘पापा गॉन’ का मतलब क्या है. उनको कुछ होगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था.”

मल्लिका साराभाई ने ही अपने पिता की चिता को अग्नि दी. विक्रम साराभाई की मां भी वहां मौजूद थीं. जब पुजारी ने जमे हुए घी को टुकड़ों में तोड़ कर चिता में डालना चाहा तो उनकी मां ने कहा, “धीरे से डालो, विक्रम को चोट लग जाएगी.”

1974 में चांद के एक क्रेटर का नाम डॉक्टर साराभाई के नाम पर रखा गया. पिछले दिनों भारत ने चंद्रमा पर अपना जो चंद्रयान भेजा है, उसकी नींव कई दशक पहले विक्रम साराभाई ने ही रखी थी.

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